आडंबर से आत्मीयता की ओर: जब जीवन में ‘राम’ उतरते हैं
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आडंबर से आत्मीयता की ओर: जब जीवन में ‘राम’ उतरते हैं

आज हमारे समाज में एक बहुत बड़ी विडंबना देखने को मिलती है—हम धर्म के बाहरी आडंबर को तो बहुत धूमधाम से सजाते हैं, लेकिन धर्म के वास्तविक मर्म को अपने जीवन में उतारने से बचते हैं। हम बड़ी-बड़ी कथाएं सुनते हैं, धार्मिक अनुष्ठान कराते हैं, लेकिन हमारे कर्म और व्यवहार उन मर्यादाओं के बिल्कुल विपरीत होते हैं।

आइए, आज रामकथा के कुछ ऐसे अनछुए पहलुओं, पारिवारिक मर्यादाओं और आंतरिक चेतना के रहस्यों को समझते हैं जो हमें खोखले प्रदर्शन से हटाकर वास्तविक शांति की ओर ले जाते हैं।

सबसे बड़ा पाखंड: भाई से मुकदमेबाजी और रामकथा का आयोजन

हाल ही में एक बड़ा ही अजीब और विचारणीय प्रसंग सामने आया। दिल्ली-एनसीआर के एक संपन्न सज्जन पिछले तीन वर्षों से बहुत दुखी थे। उनके दुखी होने का कारण कोई बीमारी या बड़ी विपत्ति नहीं थी, बल्कि अपने छोटे भाई के साथ सुप्रीम कोर्ट में चल रहा संपत्ति का मुकदमा था। जैसे ही वे मुकदमा जीते और उन्हें “मुक्ति” मिली, वे अपने फार्म हाउस पर ‘अपने-अपने राम’ (रामकथा) कराने के लिए उत्सुक हो गए।

जरा सोचिए, इससे बड़ी विडंबना (Hypocrisy) और क्या होगी? जो व्यक्ति अपने सगे भाई का अधिकार छीनने के लिए न्यायालय के चक्कर काट रहा हो, जिसने भाईचारे का खून किया हो, वह मंच पर बैठकर भगवान राम और उनके अनुज लक्ष्मण के अनन्य प्रेम की कथा सुनने की तैयारी कर रहा है!

सीख: “यदि हमारे घरों में भाई-भाई के बीच प्रेम नहीं है, यदि हम सुई की नोक के बराबर जमीन के लिए अपनों से महाभारत करने को तैयार हैं, तो हमारे द्वारा कराई गई कोई भी कथा केवल एक मनोरंजन है, साधना नहीं।”

चिंता (Anxiety) क्या है? हमारी इच्छा और ईश्वरीय विधान का अंतर

आज के समय में अवसाद, तनाव और ‘एंजायटी’ बहुत आम शब्द बन गए हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि यह मानसिक अशांति पैदा कहाँ से होती है?

वास्तव में:$$\text{चिंता (Anxiety)} = \text{हमारी इच्छा} – \text{ईश्वर की इच्छा}$$

जब ईश्वर हमारे लिए कुछ और तय करता है और हम अपनी संकुचित बुद्धि से कुछ और ही मांगते रहते हैं, तो उस खाली अंतर (Gap) से ही चिंता का जन्म होता है। हमने पूरी कोशिश की, लेकिन परिणाम वैसा नहीं आया जैसा हम चाहते थे। अगर उस क्षण हम रोने-धोने के बजाय ईश्वर के चरणों में सिर रख दें और कहें—“प्रभु! तेरी मर्जी में ही मेरी मर्जी है”, तो जीवन की आधी चिंताएं उसी क्षण कपूर की तरह उड़ जाएंगी।

ईश्वर से कभी सांसारिक वस्तुएं मत मांगिए। वह संपूर्ण ब्रह्मांड का स्वामी है, उसे सब पता है कि हमारे लिए कब, क्या और कितना मंगलकारी है।

कौशल्या और राम: विपत्ति को ‘मंगल’ मानना

जब अचानक राज्याभिषेक रुक गया और भगवान राम को वनवास मिला, तो माता कौशल्या व्याकुल हो गईं। उन्होंने जब राम से पूछा कि उत्सव की शहनाइयां अचानक क्यों मौन हो गईं? तब राम जी ने यह नहीं कहा कि मुझसे मेरा राज्य छीन लिया गया। यही राम की मर्यादा है!

राम ने मुस्कुराते हुए कहा:

“पितादीन मोही कानन राजू, जहाँ सब भाँति मोर बड़ काजू…”

(अर्थात: माता, पिताजी ने मुझे वन का राज्य दिया है, जहाँ मेरे लिए हर प्रकार से बड़ा कल्याण छिपा हुआ है।)

यह है जीवन जीने की कला! जब हमसे कुछ छोटा छूट जाता है, तो हमें लगता है कि हम बर्बाद हो गए। लेकिन ईश्वर जब हाथ से कुछ छीनता है, तो वह किसी बहुत बड़ी और दिव्य योजना की तैयारी कर रहा होता है। यदि उस रात राम जी ने अयोध्या का राजा बनने के लिए जिद की होती, तो अयोध्या को राजा राम तो मिल जाते, लेकिन इस संपूर्ण संसार को “भगवान राम” कभी न मिलते।

लक्ष्मण की निष्ठा: जहाँ राम, वहीं अयोध्या

हमारे समाज में संपत्ति के झगड़े इसलिए अदालतों में पड़े हैं क्योंकि हमारे पास ‘लक्ष्मण’ जैसा त्याग और ‘भरत’ जैसा आदर नहीं है। लक्ष्मण तो वह हैं जिन्हें बचपन से ही पता था कि उनका परम मंगल बड़े भाई के चरणों में है।

जब राम वन जाने लगे और लक्ष्मण अपनी माता सुमित्रा से आज्ञा लेने गए, तो सुमित्रा जी ने एक अद्भुत बात कही:

“तात तुम्हार मात वैदेही, पिता राम सब भाँति स्नेहू।

अवध तहाँ जहाँ राम निवासू, तहँइँ दिवसु जहँ भानु प्रकासू॥”

सुमित्रा जी ने कहा—“बेटा! तेरी असली माँ सीता है और पिता स्वयं राम हैं। जहाँ राम रहेंगे, वहीं असली अयोध्या है। यदि वन में सेवा करते हुए तेरा बाल भी बांका हुआ, तो वह जीवन की सबसे बड़ी सार्थकता होगी।”

जब पालने में रो पड़े थे नन्हे लक्ष्मण: एक मार्मिक गाथा

जब चारों राजकुमारों का जन्म हुआ, तो पूरी अयोध्या उनके दर्शन के लिए उमड़ पड़ी। गुरु वशिष्ठ की आज्ञा से चारों बालकों को पालने में लिटाया गया। राम जी मुस्कुरा रहे थे, भरत और शत्रुघ्न भी शांत थे; लेकिन नन्हे लक्ष्मण रोने लगे। वे इतना रोए कि राज्य के बड़े-बेड़े वैद्य और ज्योतिषी भी हार गए, पर रोना बंद नहीं हुआ।

अंत में गुरु वशिष्ठ ने रहस्य को समझा। उन्होंने लक्ष्मण को उठाया और राम जी के चरणों की ओर लिटा दिया। जैसे ही लक्ष्मण का सिर राम जी के चरणों से स्पर्श हुआ, वे तुरंत शांत हो गए और मुस्कुराने लगे।

काव्य रस:

“गुरु ने उठाया और लखन को राम के चरण में लिटाया, तो लखन चुप हो गए…

लेटते ही करुणा सदन चुप हो गए…”

यह कथा हमें सिखाती है कि हमारी आत्मा भी तब तक अशांत होकर रोती रहती है, जब तक उसे परमात्मा के चरणों का आश्रय नहीं मिल जाता।

नोएडा के दो भाइयों की दर्दनाक कहानी: बहीखाता बनाम रामकथा

कुछ वर्ष पहले उत्तर प्रदेश के नोएडा में एक बहुत ही दर्दनाक वास्तविक घटना घटी। दो भाई थे, जिनके पास हजारों करोड़ रुपये की असीम संपत्ति थी। लेकिन दोनों के बीच ५०-६० करोड़ रुपये के एक फार्म हाउस को लेकर विवाद हो गया। लाखों करोड़ की संपत्ति होने के बावजूद दोनों में से कोई भी झुकने को तैयार नहीं था।

विवाद इतना बढ़ा कि दोनों भाइयों के सुरक्षाकर्मियों और स्वयं उन दोनों ने एक-दूसरे पर गोलियां चला दीं। दोनों मौके पर ही दम तोड़ गए। जब पुलिस की गाड़ी आई, तो बड़े भाई की गोद में छोटे भाई का बेजान सिर रखा हुआ था।

यदि उन भाइयों ने केवल तिजोरियों के बहीखातों के स्थान पर रामकथा के पारिवारिक मूल्यों को जीवन में उतारा होता, तो आज वे दोनों एक-दूसरे का संबल बनकर जीवित होते।

आधुनिक तरक्की का अंधेरा: “जहनों में अंधेरे हैं, सड़कों पर उजाले हैं”

आज मुंबई और दिल्ली जैसे महानगर पूरी रात जागते हैं। लेकिन क्या यहाँ के मनुष्य के भीतर सचमुच का ‘जागरण’ है? आधुनिक तरक्की की चकाचौंध पर एक कवि ने बहुत सटीक लिखा है:

“इस दौरे तरक्की के अंदाज निराले हैं,

जहनों में अंधेरे हैं, सड़कों पर उजाले हैं।”

हम बड़े-बड़े घरों में रहते हैं, हमारी रसोई में महंगे शेफ खाना बनाते हैं, लेकिन हमारे भीतर की आत्मीयता मर चुकी है। एक समय था जब हम चाहते थे कि कोई मेहमान आए तो हम प्रेम से भोजन साझा करें। आज का दौर यह आ गया है कि हम मन ही मन सोचते हैं—“यह मेहमान जल्दी चला जाए तो मैं चैन से खाना खाऊँ।”

यदि हमें इस आंतरिक अंधेरे को दूर करना है, तो हमें अपने हृदय की देहरी पर राम-नाम रूपी मणि का दीपक रखना होगा, जिससे भीतर और बाहर दोनों ओर आत्मीयता का प्रकाश फैल सके।

कबीर का शाश्वत संदेश: “घना दिन सो लियो रे अब तू जाग मुसाफिर जाग…”

हमारी नींद बहुत गहरी और सदियों पुरानी है। हम गर्भ से ही सोते आ रहे हैं। गर्भ में हम भगवान से वादा करते हैं कि बाहर आकर केवल तेरा स्मरण करेंगे, पर बाहर आते ही सांसारिक रिश्तों के मोह में सो जाते हैं। फिर जवानी और परिवार के सुखों की सेज पर सो जाते हैं। और अंत में हम चिता की सेज पर पैर पसार कर सो जाते हैं, जहाँ से जागने का कोई अवसर नहीं मिलता।

संत कबीरदास जी हमें सचेत करते हुए गाते हैं:

“घना दिन सो लियो रे, अब तू जाग मुसाफिर जाग…

पहले सोयो माता की कोख में, उल्टा होकर झूला,

वचन दिया था भजन करूँगा, बाहर आकर भूला…”

निष्कर्ष: सब भगवान के भरोसे छोड़ दो

यदि आज आपके मन में भी कोई बेचैनी है, कोई पारिवारिक उलझन है, तो उसे अपनी नकारात्मकता मत बनाइए। अपनी पूरी ईमानदारी से कर्म कीजिए और परिणाम को उस परम सत्ता के न्याय पर छोड़ दीजिए। अगली बार जब भी कोई राह न सूझे, तो इस विश्वास के साथ आगे बढ़िए:

“जब तुझसे ना सुलझे तेरे उलझे हुए धंधे,

भगवान के इंसाफ पर सब छोड़ दे बंदे।

खुद ही तेरी मुश्किल को वो आसान करेगा,

जो तू नहीं कर पाया वो भगवान करेगा…”

नोट (Disclaimer): अध्यात्मिक सार पर दी गई सभी कहानियाँ, पौराणिक प्रसंग और वैचारिक व्याख्याएँ विभिन्न आध्यात्मिक ग्रंथों, संतों के वचनों और पारंपरिक मान्यताओं पर आधारित हैं। हम अपने पाठकों से विनम्र अनुरोध करते हैं कि जीवन में किसी भी बड़े आध्यात्मिक या व्यावहारिक निर्णय को लेने से पहले अधिकृत विशेषज्ञों, आचार्यों अथवा प्रमाणित मार्गदर्शन का सहारा अवश्य लें।

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